Language
केंद्र का ध्यानाकर्षण क्षेत्र


वायु प्रदूषण


भारत में उच्च पर्यावरणीय रोगों का बोझ इस बात से परिलक्षित होता है कि वायु प्रदूषण इस देश मे बीमारी के बोझों के खतरनाक कारकों के रूप में प्रमुख स्थान रखता है।

ग्लोबल बर्डेन ऑफ़ डिजीज 2013 रिपोर्ट (भारत) के अनुसार घरेलू और परिवेशीय वायु प्रदूषण (एचएपी और एएपी) शीर्ष जोखिम वाले कारकों में शामिल हैं जिनसे कई प्रतिकूल स्वास्थ्य समस्याएँ होती हैं| इन समस्याओं में श्वसन और हृदय रोग शामिल हैं जो की वायु प्रदूषण से होने वाली समयपूर्व मृत्यु के मुख्य कारण हैं । वर्ष 2000 के बाद से वायु प्रदूषण की वजह से सालाना समयपूर्व मृत्यु की संख्या में छह गुना की बढ़ोतरी हुई है। 2013 में लगभग १४ लाख भारतीयों की मौत वायु प्रदूषण के कारण हुई। भारत में बायोमास कुक स्टोव के व्यापक इस्तेमाल के कारण वायु प्रदूषण सम्बंधित रोगो के बोझ असर मुख्य रूप से गरीबों (विशेषकर महिलाओं और बच्चों) पर होता है।भारतीय महिला, अपने आहार और खराब पोषण संबंधी स्थिति के कारण, पर्यावरणीय प्रभाव के लिए अतिसंवेदनशील हो सकती हैं, जिससे उन्हें आगे नकारात्मक स्वास्थ्य परिणाम मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

इसे समझने के लिए यह केंद्र महामारी विज्ञान और गुणात्मक अनुसंधान के प्रयासों से शहरी और ग्रामीण समुदायों के स्वास्थ्य पर परिवेश और घरेलू वायु प्रदूषण के प्रभाव का पता लगाएगा। स्वास्थ्य के लिए लाभकारी नीतियों को प्रभावित करने के लिए नीति निर्माताओं के साथ परस्पर संपर्क; संवेदनशील समुदायों और सामान्य जनता के साथ इसके खतरों के बारे में संचार का प्रयास करना|



बच्चों का पर्यावरणीय स्वास्थ्य


बच्चे पर्यावरण प्रदूषण के नकारात्मक स्वास्थ्य प्रभावों के लिए विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं क्योंकि उनके दिमाग और शरीर अभी भी विकसित हो रहे होते हैं।

हर वर्ष पांच साल की उम्र से छोटे लाखों बच्चों की मृत्यु पर्यावरण संबंधी जोखिम कारणों से हो जाती है। चिंता है कि भारत जैसे तेजी से विकासशील देशों में वायु प्रदूषण के उच्च स्तर का सम्बन्ध समय से पहले बच्चे के जन्म और जन्म के वक़्त कम वजन से हो सकता है। जहरीले रसायनों, पौष्टिक असंतुलन और मनोवैज्ञानिक तनाव के प्रारंभिक संपर्क भी असंक्रामक रोग (Non-Communcable Disease) की शुरुआत और प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

माना जाता है कि गर्भाशय में और नवजात शिशुओं के प्रारंभिक विकास के दौरान कम स्तर का पर्यावरणीय जोखिम भी लंबे समय तक वयस्क जीवन में पूस्वास्थ्य पर प्रभाव डाल सकता है। भारत में बच्चो और किशोरावस्था युवाओं की बड़ी आबादी है, जहाँ उनके पर्यावरणीय प्रदूषण से संपर्क की संभावना बहुत ज्यादा है। भारत में बच्चों और युवाओं के रोग के पर्यावरणीय बोझ को बेहतर ढंग से समझने के लिए यह केंद्र उनके प्रारंभिक जीवन में जोखिमों की जाँच करेगा।



जलवायु परिवर्तन


मानवजनित जलवायु परिवर्तन से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है, जो भारत जैसे कम और मध्यम आय वाले देशों को अनुपातहीन ढंग से प्रभावित करेगा।

अनुमान है कि बाढ़, तूफान, सूखे और लू (हीट वेव) जैसे चरम मौसम की घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता से रुग्णदर और मृत्युदर में वृद्धि होती है संवेदनशील आबादी जिनमे बच्चे, बुजुर्ग और ग़रीब शामिल हैं मुख्य रूप से प्रभावित होते हैं।विश्व बैंक की एक रिपोर्ट से पता चला है कि भारत की खाद्य सुरक्षा, जल संसाधन और स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन की वजह से खतरे में हैं।

गुजरात में चल रहा क्षोध, अत्यधिक गर्मी की घटनाओं और मृत्यु दर के बीच के संबंध की जांच कर रहा है। इस कार्य से राज्य भर में गर्मी क्रिया योजना का विकास हुआ है जिसका उद्देश्य चरम गर्मी की घटनाओं के दौरान मृत्यु दर कम करना है; और संवेदनशील आबादी के लिए अत्यधिक गर्मी के दिनों में लू या उससे होने वाले जोखिमों से बचने के लिए स्वास्थ्य संचार योजना का विकास हुआ है। इन गतिविधियों को भारत के अन्य शहरों में फैलाने के लिए केंद्र इस काम को और विस्तारित करेगा। इस काम के अतिरिक्त केंद्र, वेक्टर-जनित बीमारियों, खाद्य सुरक्षा, पोषण और पानी तक पहुंच पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की जांच करेगा। सुरक्षितता और अनुकूलन योग्यता अध्ययन शहर योजनाकारों के साथ मिलकर आयोजित किए जाएंगे जो कि असंगत रूप से प्रभावित समुदायों और जनसंख्या की पहचान करने के लिए होगी।



विषाक्त रसायनो का एक्सपोज़र


हम हर दिन कई रसायनों के संपर्क में आते हैं।हालांकि इनमें से कुछ रासायनिक एक्सपोजर सुरक्षित हैं, अन्य नहीं हैं, और हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।

हानिकारक रसायनों का जोखिम हवा, पानी और भोजन के माध्यम से होता है। कई कारको जैसे रसायन का प्रकार और उसकी मात्रा, जोखिम की अवधि एवं आवृत्ति, जोखिमों का स्रोत, ये सभी रसायन की शरीर के साथ प्रतिक्रिया और उसके प्रभाव को प्रभावित करते हैं।

भारत में रासायनिक एक्सपोजर पर अधिकतर अध्ययन विष विज्ञान के क्षेत्र में पशु या जीवकोषीय प्रयोगों में हुआ है।मानव आबादी पर जोखिम कारक (एक्सपोज़र) और बीमारी के बीच खुराक-प्रतिक्रिया या कारण संबंध को समझने के लिए किया जा रहा काम अभी प्रारंभिक अवस्था में है। पर्यावरण प्रदूषकों और स्वास्थ्य परिणामों के बीच संबंधो के बारे में साक्ष्य इकठ्ठा करने के लिए केंद्र इस क्षेत्र में जरुरी अनुसंधानों का आयोजन करेगा| इस क्षेत्र में भारत में उच्च गुणवत्ता वाले जैविक पुष्टि के साथ महामारियों के प्रमाण बहुत ही अल्प हैं।



जल, स्वच्छता एवं सफाई (WASH)


स्वच्छ जल, शौचालयों तक पहुंच, और अच्छी सफाई की प्रथाओं बेहतर स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं, और मानव स्वास्थ्य एवं कल्याण के लिए काफी योगदान देते हैं, खासकर लड़कियों और महिलाओं के लिए।

इस कारण स्वच्छता की पहुंच में सुधार पर्यावरणीय रोगों के बोझ को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह उन वातावरणों के निर्माण में भी मदद करता है जिसमे भारत के लोगो, विशेष रूप से महिलाओं और लड़कियों, के लिए गरिमा, आत्मसम्मान और सुरक्षा को बढ़ावा मिलता है। निर्मल भारत अभियान और स्वच्छ भारत अभियान जैसे सरकारी कार्यक्रमों को पूरे भारत में शौचालयों के निर्माण के द्वारा खुले में शौच के मुद्दे को हल करने के लिए बनाया गया है। हालांकि, साक्ष्य बताते हैं कि अकेले शौचालय निर्माण भारत की ख़राब साफ-सफाई और स्वच्छता की स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। विभिन्न पर्यावरणीय और सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों की बाधाएं हैं और सम्पूर्ण भारत में स्वच्छता कार्य की बेहतरी के लिए इनको संबोधित आवश्यक होगा।

शौचालयों तक पहुंचने की कमी से जुड़े प्रतिकूल स्वास्थ्य परिणामों और शौचालयों के उपयोग में बाधा डालने वाले कारकों को समझने; और समुदाय-आधारित हस्तक्षेपों के डिज़ाइन से शौचालयों के उपयोग वृद्धि के लिए केंद्र के प्रयास केंद्रित होंगे।

Partners